West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल का नदिया जिला राज्य की राजनीति का एक बेहद अहम और संवेदनशील इलाका माना जाता है. बांग्लादेश सीमा से सटा यह जिला हर चुनाव में सत्ता की दिशा तय करने वाला साबित होता रहा है. यहां कुल 17 विधानसभा सीटें हैं और मुकाबला हमेशा बेहद कांटे का रहा है.
2021 के चुनाव में नदिया पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया था. बीजेपी ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की… जबकि टीएमसी ने 8 सीटें अपने नाम कीं. यानी जिला पूरी तरह फिफ्टी-फिफ्टी रहा.
नादिया में मतुआ समुदाय की बड़ी आबादी है
नदिया में मतुआ समुदाय की बड़ी आबादी है. जिसे बीजेपी का पारंपरिक वोटर माना जाता रहा है. लेकिन SIR प्रक्रिया में वोट कटने से पैदा हुए पहचान के संकट के बीच उठते सवालों ने इस वोटबैंक में असमंजस पैदा कर दिया है.
अगर पिछले चुनावी इतिहास पर नजर डालें. तो 2011 के बदलाव चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई में टीएमसी ने यहां 12 सीटें जीतकर लेफ्ट को सिर्फ 5 सीटों पर समेट दिया था.
इसके बाद 2016 में टीएमसी ने अपनी पकड़ और मजबूत की. और 17 में से 13 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन सिर्फ 4 सीटों तक सिमट गया.
समय के साथ समीकरण में आता रहता है बदलाव
यानी नदिया में हर चुनाव के साथ समीकरण बदलते रहे हैं. और इस बार भी नजरें इसी फिफ्टी-फिफ्टी जिले पर टिकी हैं. इस बीच कल्याणी में जात्रासिद्धि गांव का प्रतिमा मिश्रा ने रुख़ किया तो पता चला यहां एक बूथ के क़रीब 1300 वोट में SIR की वजह से 600 से ज़्यादा नाम कट गए हैं. वहीं कल्याणी के जात्रासिद्धि गांव में हमारी बातचीत कई स्थानीय लोगों से हुई. जिनका ये भी कहना है कि वोटर लिस्ट से सिर्फ मुसलमानों के नहीं, बल्कि हिंदू परिवारों के भी नाम कटे हैं.
ग्रामीणों का सवाल है कि जब दोनों समुदायों के वोट कटे हैं. तो फिर बीजेपी क्यों कह रही है कि सबको बांग्लादेश भेजा जाएगा.
लोगों का कहना है कि इस बयान से उनके भीतर डर भी है और गहरा दुख भी.
महिलाओं ने क्या बताया है?
इस गांव में हमने कुछ महिलाओं से भी बात की जिन्हें चुनाव में हर दल ने लुभाने की कोशिश की, जाना की क्या वाक़ई महिलाओं यहाँ डर के साये में रहती हैं जिसे दूर करने का चुनावी वादा बीजेपी कर रही है तो सुनिए उन्होंने कहा, ‘हमे तो कोई डर नहीं हैं, ममता ने अच्छा काम किया है. क्या हुआ क्या नहीं न्यूज़ में सुनते हैं तो पता चलता है. हमरी बेटियाँ पढ़ने शहर जाती हैं बिना डरे.’
इस गांव में हम जहाँ भी गए किसी ना किसी घर या परिवार में वोट काटे जाने के मामले मिले जिसको लेकर लोगों में गुस्सा भी था और वोट न दे पाने का अफसोस भी. भुट्टा छील रहे परिवार से बात, e-रिक्शा पर बैठ कर वोट बचने और कटने वाले चेहरो को दिखाते हुए कहा कि जिनका अधिकार सही सलामत है वो खुश हैं और जिनके वोट कटे हैं उनमे दुख और गुस्सा है.
नादिया के इस गांव में आने जाने का एक ही रास्ता है वो है जंग लगे लोहे और टूटी लकड़ी का पुल बावजूद इसके यहां बदलसे लोगों की शिकायत सुविधाओं की कमी को लेकर नहीं बल्कि SIR के बाद पैदा हुआ पहचान का संकट है.
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