उन्नाव रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी गई थी. शुक्रवार (15 मई, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने मामला वापस दिल्ली हाईकोर्ट को भेजकर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है. पिछले साल 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत के आदेश पर भी रोक लगा दी थी.
पिछले साल दिसंबर में हाईकोर्ट ने सेंगर को यह कहते हुए जमानत दी थी कि विधायक को पॉक्सो एक्ट के तहत लोकसेवक नहीं माना जा सकता. सीबीआई की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी. आज मामले को दोबारा विचार के लिए हाईकोर्ट के पास भेज दिया.
देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने हाईकोर्ट को यह भी निर्देश दिया है कि वह कुलदीप सेंगर की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के खिलाफ दायर मुख्य याचिका पर दो महीने के अंदर फैसला करने का प्रयास करे. कोर्ट के आदेश में कहा गया कि अगर हाईकोर्ट के लिए मुख्य याचिका पर शीघ्रता से निर्णय लेना संभव नहीं है तो उसे कोर्ट की समर वेकेशन शुरू होने से पहले सेंगर की उस याचिका पर आदेश पारित करना चाहिए जिसमें आजीवन कारावास को निलंबित करने की मांग की गई है.
कोर्ट ने इस मुद्दे पर भारी जन आक्रोश के बाद सेंगर को जमानत देने वाले हाईकोर्ट के आदेश को पहले ही रद्द कर दिया था. बेंच ने कहा कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और हाईकोर्ट इस पर नए सिरे से सुनवाई कर सकता है. सीजेआई सूर्यकांत ने हाईकोर्ट से ऐसे नए मुद्दों पर फैसला लेने को भी कहा कि क्या किसी विधायक को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने के दौरान भी लोक सेवक माना जा सकता है.
इससे पहले, कोर्ट ने बलात्कार मामले में पूर्व विधायक की आजीवन कारावास की सजा के निलंबन को चुनौती देने वाली केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की याचिका पर सुनवाई मई के पहले सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दी थी.
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर, 2025 के अपने आदेश में कहा था कि सेंगर को पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 (सी) (लोक सेवक द्वारा गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराया गया था, लेकिन एक निर्वाचित प्रतिनिधि भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत ‘लोक सेवक’ की परिभाषा के दायरे में नहीं आता है.
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उन्नाव बलात्कार मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कुलदीप सेंगर के कारावास को हाईकोर्ट ने उसकी अपील पर सुनवाई लंबित रहने तक निलंबित कर दिया था और कहा था कि पूर्व विधायक ने पहले ही सात साल और पांच महीने की सजा काट ली है. हाईकोर्ट के इस आदेश की समाज के विभिन्न वर्गों ने आलोचना की और पीड़िता, उसके परिवार और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया.
(निपुण सहगल के इनपुट के साथ)
