Explained: एक गोली से 72 घंटे नींद गायब, भूख-प्यास खत्म और खुद पर आक्रामक भरोसा! भारत में पकड़ाए ‘जिहादी ड्रग’ की अनोखी कहानी


एक गोली जो आपको 72 घंटे तक जगाए रखे. भूख-प्यास को ऐसे गायब कर दे जैसे ये शरीर की जरूरत ही नहीं. डर को पूरी तरह खत्म कर दे और अंदर एक अजीब सा आक्रामक आत्मविश्वास भर दे. सुनने में ये किसी सुपर-सोल्जर की दवा जैसा लगता है, लेकिन यही असली खतरा है. इसका नाम है कैप्टागन यानी फेनेथिलाइन. अंडरवर्ल्ड में इसकी पहचान है- ‘जिहादी ड्रग.’

कैप्टागन: एक दवा जो ‘दानव’ बन गई

कैप्टागन की शुरुआत किसी आतंकी साजिश के तौर पर नहीं, बल्कि एक मेडिकल चमत्कार के तौर पर हुई थी. यह 1960 के दशक की बात है जब जर्मनी के वैज्ञानिकों ने फेनेथिलाइन नाम का एक सिंथेटिक स्टिमुलेंट (उत्तेजक) विकसित किया. मकसद बिल्कुल साफ और नेक था- जो बच्चे जरूरत से ज्यादा चंचल और शरारती हैं (जिसे अब अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर यानी ADHD कहते हैं) या जो लोग नार्कोलेप्सी (दिन में अचानक सो जाने की बीमारी) और डिप्रेशन से जूझ रहे हैं, उनके इलाज के लिए ये दवा कारगर साबित हो रही थी. शुरुआती दिनों में यूरोप और अमेरिका में इसे खूब प्रचलित हुई और कुछ समय के लिए तो यह बाजार में छाई रही, लेकिन जल्द ही इसके साइड इफेक्ट सामने आने लगे.

मरीजों को तेज विजुअल हैलुसिनेशन (ऐसी चीजें दिखना जो हैं ही नहीं), साइकोसिस (दिमागी संतुलन बिगड़ना), हार्ट अटैक और दौरे पड़ने की शिकायतें आने लगीं. नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक तक आते-आते दुनिया के ज्यादातर देशों ने इसे बैन कर दिया. अमेरिका ने तो 1981 में ही इसे शेड्यूल-1 ड्रग (सबसे खतरनाक श्रेणी) की लिस्ट में डाल दिया था. कुछ यूरोपीय देशों में 2013 तक सीमित चिकित्सकीय उपयोग की इजाजत जरूर रही, लेकिन उसके बाद ये पूरी तरह गैर-कानूनी हो गई. अब सिर्फ सीरिया, लेबनान और दक्षिणी यूरोप की सीक्रेट लेबोरेटरीज में अवैध रूप से इसका उत्पादन होता है. सऊदी अरब जैसे देशों में तो यह इतनी बड़ी समस्या बन चुकी है कि पूरे क्षेत्र में होने वाली 80% जब्ती अकेले वहीं होती है.

इस ड्रग का संबंध अक्सर चरमपंथी समूहों और हिंसक संघर्षों में शामिल लड़ाकों से जोड़ा जाता है, इसीलिए इसे आमतौर पर ‘जिहादी ड्रग’ कहा जाता है.

आसमान से बरस रही हैं गोलियां और हवाला का खेल

कैप्टागन की तस्करी का तरीका भी कम दिलचस्प नहीं है. पहले जहां सीमाओं पर इंसानी कूरियर और ड्रोन का इस्तेमाल होता था, वहीं अब तस्करों ने नया और बेहद सस्ता तरीका ढूंढ निकाला है- हवाई गुब्बारे (एयरबोर्न बैलून सिस्टम). ये गुब्बारे बड़ी मात्रा में ड्रग लेकर सीमा पार कर सकते हैं. यही वजह है कि असद के शासन के बाद तस्करी के प्रयास तो एक-तिहाई रह गए हैं, लेकिन सफलता की दर 25% से बढ़कर 57% हो गई है.

इसके अलावा, इस पूरे खेल को चलाने के लिए हवाला जैसे प्राइवेट फाइनेंशियल नेटवर्क और फर्जी ट्रेड डॉक्यूमेंट्स का बखूबी इस्तेमाल होता है. जांच एजेंसियों को शक है कि इस ड्रग ट्रेड से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा आतंकी गतिविधियों को फंड करने में जाता है.

दिल्ली और मुंद्रा से पकड़ी गई 182 करोड़ की ‘गोली’

अब इस दवा ने भारत की सीमाओं पर भी दस्तक दे दी है. मई 2026 में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ‘ऑपरेशन रेजपिल’ के तहत इस ड्रग की पहली बड़ी खेप पकड़ी है, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 182 करोड़ रुपये आंकी गई है. कुल 227.7 किलोग्राम कैप्टागन टैबलेट और पाउडर पकड़ा गया. इतनी बड़ी मात्रा को अंदाज में समझें तो इससे लाखों गोलियां बन सकती थीं.

ये सारा मामला तब खुला जब 11 मई 2026 को NCB की टीम ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक मकान पर छापा मारा. वहां से 31.5 किलो कैप्टागन की गोलियां बरामद हुईं, जिन्हें बड़ी चालाकी से एक कमर्शियल चपाती बनाने की मशीन में छिपाकर रखा गया था. इसे सऊदी अरब के जेद्दाह शहर भेजा जाना था. इसके बाद पूछताछ में जो खुलासा हुआ, उसने सबको चौंका दिया. गिरफ्तार सीरियाई नागरिक अलाब्रास अहमद की निशानदेही पर गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर एक कंटेनर से 196.2 किलो कैप्टागन पाउडर और बरामद हुआ. ये पाउडर सीरिया से आयातित भेड़ की ऊन की आड़ में छिपाकर लाया गया था.

‘गरीबों का कोकीन’ और ब्लैक मार्केट की करेंसी

इस कार्रवाई के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मोदी सरकार ड्रग-फ्री इंडिया के लिए प्रतिबद्ध है. हम हर उस ग्राम ड्रग पर शिकंजा कसेंगे जो भारत की सीमा में प्रवेश करेगी या हमारी जमीन को ट्रांजिट रूट के तौर पर इस्तेमाल करेगी.’ लेकिन इस ड्रग की कहानी सिर्फ एक बड़ी बरामदगी तक सीमित नहीं है.

कैप्टागन को अंडरवर्ल्ड में ‘गरीबों का कोकीन’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह बनाने में बेहद सस्ती पड़ती है, लेकिन एक बार इसकी लत लग जाए तो शरीर और दिमाग पर इसका असर कोकीन से कम नहीं होता. पश्चिमी एशिया के युद्धग्रस्त इलाकों में तो यह एक तरह से ब्लैक मार्केट की करेंसी बन चुकी है.

शरीर पर क्या असर करती है ये ‘जिहादी ड्रग’?  

जब कोई शख्स इस गोली को निगलता है, तो यह कुछ ही मिनटों में दिमाग पर हमला कर देती है:

  • शुरुआती असर में दिल की धड़कन तेज हो जाती है, ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है और शरीर का तापमान बढ़ जाता है.
  • इंसान को लगता है जैसे उसके अंदर असीमित ऊर्जा भर गई है.
  • नींद और थकान का नामोनिशान मिट जाता है और दिमाग में एक अजीब सा आत्मविश्वास और खुशी का एहसास होता है.
  • यही वो ‘खुमारी’ है जिसके लिए लड़ाके इसे लेते हैं ताकि वो बिना रुके, बिना डरे और पूरी बेरहमी के साथ लड़ सकें.
  • लंबे समय तक इसका सेवन शरीर को अंदर से खोखला कर देता है.
  • इसके बाद आता है क्रैश यानी घोर डिप्रेशन, सुस्ती, नींद न आने की बीमारी, ब्लड और नसों को भारी नुकसान.

NCB की अब तक की सबसे बड़ी जीत और अगली जंग

NCB की ये कार्रवाई भारत के लिए एक बड़ी जीत है, क्योंकि इससे एक नए और बेहद खतरनाक ट्रेंड का पर्दाफाश हुआ है. जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार सीरियाई नागरिक के तार देहरादून स्थित एक गुप्त लैब से भी जुड़े हैं, जहां इस ड्रग को बनाया जा रहा था. इस लैब को चलाने के लिए सहारनपुर के एक शख्स संजय कुमार ने अपनी फैक्ट्री 50,000 रुपये रोज के किराए पर दे रखी थी. यहां महज 14 दिनों में 2 लाख से ज्यादा गोलियां बना ली गई थीं. यह पहला मामला है जब भारत में इस ड्रग की मैन्युफैक्चरिंग पकड़ी गई है.

अभी खतरा टला नहीं है, NCB एक दूसरे सीरियाई नागरिक की तलाश कर रही है जो इस नेटवर्क का अहम किरदार है. सुरक्षा एजेंसियों को चिंता है कि कहीं भारत सिर्फ एक ट्रांजिट प्वाइंट भर न रह जाए. जिस तरह से यह ड्रग युद्ध और आतंक की इकोनॉमी चलाती है, उसका भारत में प्रवेश देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.



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