Explained: 10 साल बाद भी हीट एक्शन प्लान अधूरा! दिल्ली में फेल और सिर्फ अहमदाबाद में पास क्यों? एक्सपर्ट्स से समझें


देश के 20 बड़े शहरों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए सरकार ने साल 2016 में जो ‘हीट एक्शन प्लान’ शुरू किया था, उसकी सच्चाई बेहद चौंकाने वाली है. दस साल बाद भी जयपुर और भोपाल समेत 19 शहरों में यह प्लान या तो अधूरा है या सिर्फ कागजों पर चल रहा है. पूरे देश में सिर्फ अहमदाबाद एक ऐसा शहर है जिसने इस योजना को पूरी गंभीरता से लागू किया और एक मॉडल तैयार किया. हर पहलू पर गौर करते हैं, जिससे तस्वीर साफ हो सके…

हीट एक्शन प्लान है क्या और इसकी शुरुआत क्यों हुई?

साल 2016 में सरकार ने दिल्ली, अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, जयपुर और चेन्नई जैसे 20 शहरों के लिए एक खास योजना बनाई. इसका सीधा मकसद था- लू के कहर को कम करना और यह सुनिश्चित करना कि भीषण गर्मी में भी शहरों का सामान्य जीवन ठप न हो.

19 शहरों का हीट एक्शन प्लान क्यों है अधूरा?

ज्यादातर शहरों ने इस प्लान को सिर्फ कुछ अस्थायी इंतजामों तक सीमित रखा. योजना के तहत 9 अहम कदम उठाए जाने थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली:

  1. पूर्व चेतावनी: 3 से 7 दिन पहले हीट वेव अलर्ट जारी करना.
  2. स्वास्थ्य तैयारी: अस्पतालों में हीट स्ट्रोक वार्ड, अतिरिक्त बेड और ORS की उपलब्धता.
  3. कूलिंग सेंटर: दिहाड़ी मजदूरों और रिक्शा चालकों के लिए ठंडे शेड बनाना.
  4. निर्माण स्थल: मजदूरों के लिए पानी, आराम और छाया की व्यवस्था.
  5. जागरूकता: लू के लक्षणों और बचाव की जानकारी देना.
  6. संरक्षण: जलाशयों और ग्रीन बेल्ट का संरक्षण.
  7. समन्वय: नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच तालमेल.
  8. बजट: एक मजबूत बजट और जवाबदेही का सिस्टम बनाना.
  9. लंबे समय के लिए उपायों की अनदेखी: कूल रूफ (घरों की छतों को सफेद रंग से पोतना), शहर का ग्रीन कवर बढ़ाने के लिए पौधरोपण और गर्मी के लिहाज से सबसे संवेदनशील इलाकों की पहचान करने जैसे लंबे समय के लिए फायदेमंद कदमों पर कोई ठोस काम नहीं हुआ.

इसके अलावा अस्थायी इंतजामों पर फोकस किया गया. यानी ज्यादातर शहरों में सिर्फ प्याऊ लगाने, गर्मी से बचने की एडवाइजरी जारी करने और अस्पतालों में कुछ अस्थायी बंदोबस्त करने भर से काम चला लिया गया. सिर्फ अहमदाबाद में प्लान सक्सेसफुल रहा. बाकी 19 शहरों में अनदेखी की गई.

4 अहम शहरों की अलग कहानियां

शहर क्या किया क्या नहीं किया
दिल्ली 11,000 ‘कूलिंग पॉइंट्स’ का लक्ष्य रखा, मेट्रो स्टेशनों और बस स्टॉप पर छबीलें लगाई गईं. कूलिंग सेंटर्स की असल संख्या दावों से काफी कम रही. कूल रूफ नहीं बनाए गए.
भोपाल अस्पतालों में ‘लू वार्ड’ बनाने के निर्देश दिए गए. शेड, कूल रूफ, हीट वेव अलर्ट सिस्टम या पौधरोपण जैसी कोई ठोस योजना लागू नहीं हुई. 1990 में शहर का ग्रीन कवर 66% था, जो अब गिरकर सिर्फ 6% रह गया है.
इंदौर 12 अस्पतालों में लू केंद्र बने और ट्रैफिक सिग्नल पर दोपहर में रेड लाइट का समय घटाया गया. संवेदनशील जगहों पर कूलिंग शेड नहीं लगे. 1990 में ग्रीन कवर 33% था, जो 2026 में घटकर 10% रह गया.
जयपुर अस्पतालों में विशेष वार्ड और ओआरएस कॉर्नर बनाए गए. निर्माण कार्य के घंटों में बदलाव की सलाह दी गई. मजदूरों के लिए पर्याप्त शेल्टर और सार्वजनिक कूलिंग स्टेशन नहीं बनाए गए.

20 में से सिर्फ अहमदाबाद क्यों बना मॉडल?

अहमदाबाद ने 2010 में लू से हुई 1200 मौतों के बाद सबक लेते हुए जो ठोस कदम उठाए, वे पूरे देश के लिए मिसाल हैं:

  • मिशन मिलियन ट्री: इसके तहत एक करोड़ पेड़ लगाए गए और 128 ऑक्सीजन पार्क विकसित किए गए.
  • कूल रूफिंग अभियान: 15,000 से ज्यादा घरों और 1000 से ज्यादा सरकारी इमारतों की छतों को सफेद रंग से पोता गया, जिससे घरों का तापमान 2 से 5 डिग्री तक कम हो गया.
  • मजबूत बजट: अहमदाबाद नगर निगम ने अपने वित्तीय वर्ष 2025-26 के 15 हजार करोड़ रुपये के कुल बजट में से 6 हजार करोड़ रुपये सिर्फ ‘क्लाइमेट एक्शन प्लान’ के लिए अलग से रखे. यह बाकी शहरों से एक बड़ा अंतर पैदा करता है.

तो फिर इस प्लान के फेल होने की वजहें क्या हैं?

सीनियर एनवॉयर्नमेंटलिस्ट डॉ. प्रोफेसर सुभाष सी. पांडे कहते हैं कि योजनाओं की विफलता के पीछे कई बड़े कारण हैं:

  • फंड की भारी कमी: हीट एक्शन प्लान के लिए फंडिंग अलग-अलग विभागों से आती है और यह बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी होती है. भारतीय जन स्वास्थ्य संस्थान (IIPH) के शोध से पता चला है कि जिन शहरों के पास औपचारिक हीट प्लान हैं, वहां गर्मी से होने वाली मौतें कम होती हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब प्लान के साथ लगातार और पर्याप्त फंडिंग हो.
  • आपदा का दर्जा नहीं: भारत के आपदा प्रबंधन ढांचे में बाढ़, भूकंप और चक्रवात की तरह हीट स्ट्रेस को अभी भी आपातकाल के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है. हालांकि, 16वें वित्त आयोग ने लू को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की सिफारिश की है, जिससे समर्पित केंद्रीय फंड का रास्ता खुल सकता है.
  • योजनाओं की नकल: NDMA खुद मानता है कि कई शहरों के प्लान की गुणवत्ता असमान है और उनमें से कई दूसरे शहरों के प्लान की नकल मात्र हैं. जहां कभी-कभार इन योजनाओं पर अमल होता भी है, तो यह पानी के कियोस्क, सार्वजनिक परामर्श और बस स्टॉप पर छायादार वेटिंग स्टॉप जैसे अल्पकालिक उपायों तक ही सीमित रहता है.
  • संरचनात्मक कमजोरियां: एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर हीट एक्शन प्लान कागजों पर मार्गदर्शी दस्तावेज भर हैं. इनमें निरंतरता और संस्थागत क्षमता की भारी कमी है.

सुभाष सी पांडे के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश तो जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन स्थानीय नगर निकायों को न तो इसे लागू करने के लिए पर्याप्त बजट दिया जाता है और न ही इस काम के लिए समर्पित स्टाफ मुहैया कराया जाता है. नतीजा यह होता है कि ज्यादातर शहरों में हीट एक्शन प्लान कागजी कार्रवाई बनकर रह जाता है. जबकि सच्चाई यह है कि कूल रूफ से 2-5 डिग्री और बड़े पैमाने पर पौधरोपण से 10-15 साल में शहर का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है.

भारत के राज्यों में हीट एक्शन प्लान की स्थिति क्या है?

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 राज्यों के 250 से ज्यादा शहरों और जिलों में हीट एक्शन प्लान लागू हैं, लेकिन इनकी हकीकत जमीन पर बहुत अलग है.

  • तमिलनाडु: इस राज्य ने लू को राज्य-स्तरीय आपदा घोषित कर दिया है, जिससे राहत कार्यों के लिए राज्य आपदा रिस्पांस फंड के इस्तेमाल का रास्ता साफ हो गया है. राज्य की शहरी हरियाली नीति के तहत शहरी क्षेत्रों में कम से कम 15% ग्रीन कवर अनिवार्य है.
  • महाराष्ट्र: यहां अमरावती नगर निगम ने बड़ी इमारतों के लिए कूल रूफ को अनिवार्य कर दिया है.
  • उत्तर प्रदेश: राज्य ने ज्यादातर जिलों में हीट एक्शन प्लान को अपना लिया है और जिला-विशिष्ट तापमान सीमाएं तय की हैं.

हीट स्ट्रोक के आंकड़े कितने डरावने हैं?

स्थिति की गंभीरता को  PIB की रिपोर्ट से समझा जा सकता है कि हीट स्ट्रोक के मामले और मौतों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है:

  • 2024: हीट स्ट्रोक के 25,000 मामले आए और 56 मौतें दर्ज हुईं.
  • 2025: यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 40,000 मामलों और 110 मौतों तक पहुंच गया.
  • 2026 की शुरुआत: अकेले महाराष्ट्र में अब तक 236 केस और 6 मौतें दर्ज हो चुकी हैं, जो इस साल भी हालात गंभीर रहने के संकेत हैं.

‘लू’ की परिभाषा बदलने की तैयारी क्यों?

बढ़ती गर्मी और ‘अल नीनो’ के असर को देखते हुए भारतीय मौसम विभाग अब ‘लू’ घोषित करने के नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. अभी तक लू का एलान सिर्फ अधिकतम तापमान के आधार पर किया जाता है, जो केरल जैसे तटीय राज्यों के लिए सटीक नहीं है. नए मानकों में उमस और ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी से शरीर पर पड़ने वाला तनाव) को भी शामिल करने की योजना है. इसका फायदा यह होगा कि उन इलाकों में भी सही चेतावनी दी जा सकेगी जहां तापमान भले ही कम हो, लेकिन उमस के कारण गर्मी का असर कहीं ज्यादा खतरनाक होता है.



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