होर्मुज की लड़ाई ईरान से चीन पर आई, क्या अमेरिका बीजिंग से लड़ेंगा युद्ध, आखिर क्या चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप?


US Iran War: ईरान से बातचीत फेल होने के बाद ट्रंप भले ही होर्मुज की नाकेबंदी करके ईरान को सबक सिखाना चाहते हों, लेकिन असल बात ये है कि अगर होर्मुज पर अमेरिकी नाकेबंदी हुई तो मामला ईरान के हाथ से निकल जाएगा. फिर इस मामले में चीन का सीधा दखल होगा, जो हर हाल में होर्मुज को खुलवाना चाहेगा. भले ही इसके लिए चीन को अमेरिका से जंग ही क्यों न करनी पड़े. यूं तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड दोनों के होर्मुज को लेकर दिए गए बयान में जमीन आसमान का अंतर है. लेकिन मकसद दोनों का एक ही है. वो है ईरान की आर्थिक तबाही. 

ट्रंप कह रहे हैं कि वो होर्मुज की नाकेबंदी करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी जहाज जो ईरान को टोल देकर होर्मुज पार कर रहा है, उसे हर हाल में रोका जाए. वहीं अमेरिकी सेना का सेंटकॉम कह रहा है कि अमेरिकी नेवी हर उस जहाज को होर्मुज में रोकेगी जो या तो ईरान के किसी पोर्ट से तेल लेकर आ रहा है या फिर वो ईरान के किसी पोर्ट पर तेल लेने जा रहा है. अमेरिकी नेवी अब चाहे जिसकी बात मानें, चाहे वो ट्रंप का आदेश माने या फिर सेंटकॉम का, इतना तो तय हो जाएगा कि ईरान किसी को भी अपना तेल बेच नहीं पाएगा.

ईरान को हर रोज होता है इतना नुकसान

अगर ऐसा हुआ तो ईरान को हर रोज करीब-करीब 276 मिलियन डॉलर का नुकसान होगा, जो वो तेल-गैस बेचने से हासिल करता है. क्योंकि तेल और गैस ही ऐसी चीज है, जिसे बेचकर ईरान करीब 80 फीसदी कमाई करता है. अगर अमेरिका होर्मुज को बंद कर देता है तो ईरान आर्थिक तौर पर तबाह हो जाएगा. इसी तबाही से बचने के लिए ईरान अब भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है और होर्मुज को अपनी शर्तों पर खोल रहा है, बंद कर रहा है.

इस होर्मुज पर अमेरिकी कब्जे से नुकसान सिर्फ ईरान का ही नहीं है बल्कि सबसे बड़ा नुकसान तो चीन का है. क्योंकि पूरी दुनिया में चीन ही है, जो सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदता है. चीन में तेल की कुल खरीद का 45 से 50 फीसदी हिस्सा होर्मुज के जरिए ही आता है. चीन में इस्तेमाल होने वाली गैस का करीब 30 फीसदी हिस्सा भी होर्मुज से ही होकर गुजरता है. 

चीन क्यों हॉर्मुज के रास्ते में दे सकता है दखल

चीन अपनी जरूरत का तेल और गैस सिर्फ ईरान से नहीं खरीदता बल्कि सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर से भी चीन की खरीदारी होती है. लेकिन सबका रास्ता एक ही है और वो है होर्मुज. और होर्मुज जबतक ईरान के कब्जे में है, चीन को कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि उसके जहाज तो होर्मुज से निकल ही रहे हैं. अभी चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून ने भी यही कहा है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को नियंत्रित करता है और यह हमारे लिए खुला है. 

डोंग जून ने कहा है- ‘हमारे जहाज होर्मुज स्ट्रेट में लगातार आ-जा रहे हैं. ईरान के साथ हमारे व्यापार और ऊर्जा समझौते हैं. हम उनका सम्मान करेंगे और अपेक्षा करते हैं कि अन्य लोग हमारे मामलों में दखल न दें.’

चीन के रक्षा मंत्री का ये बयान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की उस धमकी के बाद आया है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि वो होर्मुज की घेराबंदी करने जा रहे हैं. और ये बयान सीधे तौर पर ट्रंप को चेतावनी सरीखा है, क्योंकि होर्मुज पर अमेरिकी कब्जे का मतलब होगा कि चीन की तेल-गैस की आधी सप्लाई तुरंत ही ठप हो जाएगी. 

अब यूं तो चीन के पास पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है. वो ESPO पाइपलाइन यानी कि Eastern Siberia–Pacific Ocean पाइपलाइन के जरिए रूसे भी भारी मात्रा में कच्चा तेल और पावर ऑफ साइबेरिया पाइपलाइन के जरिए प्राकृतिक गैस खरीदता है. 

इसके बावजूद अगर होर्मुज बंद हुआ तो फिर चीन भी लंबे समय तक न तो तेल की कमी झेल पाएगा और न ही गैस की किल्लत. और मजबूरी में उसे फिर होर्मुज खुलवाने के लिए मैदान में उतरना ही पड़ेगा जिसकी नतीजा अमेरिका से सीधे टकराव के तौर पर भी सामने आ सकता है. अभी तो ट्रंप और उनके मित्र नेतन्याहू मिलकर भी ईरान को नहीं संभाल पा रहे हैं, अगर चीन की इस पूरे सीन में एंट्री हुई तो फिर तो पूरा खेल ही बदल जाएगा, जो कोई भी नहीं चाहेगा.

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