देश में हायर एजुकेशन का दायरा बीते सालों में तेजी से बढ़ा है. नए कॉलेज खुले, नई यूनिवर्सिटियां बनीं और पहले से ज्यादा छात्र पढ़ाई से जुड़े. कागज पर तस्वीर काफी चमकदार दिखती है. लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी सामने खड़ा है क्या यह बढ़ोतरी हर छात्र तक बराबर पहुंची? क्या इतनी संख्या में संस्थान होने के बाद भी हर जिले के युवाओं को अच्छी पढ़ाई का मौका मिल पा रहा है?
स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 की रिपोर्ट बताती है कि आज जो संख्या हम देख रहे हैं, वह आजादी के समय की तुलना में कई गुना ज्यादा है. 1950 में देशभर में करीब 1,600 कॉलेज और यूनिवर्सिटी थीं. इनमें से अधिकतर सरकारी थे. धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई और 2022 तक देश में 69,000 से अधिक कॉलेज और विश्वविद्यालय हो गए. यह आंकड़ा सुनकर लगता है कि अब शिक्षा की कमी नहीं होगी.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा हाल के वर्षों में हुआ है और इसमें निजी संस्थानों की भूमिका ज्यादा रही है. यानी अब शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी हाथों में है. इससे एक तरफ सीटें बढ़ीं, लेकिन दूसरी तरफ फीस भी बढ़ी, जिससे गरीब और ग्रामीण छात्रों के लिए पढ़ाई तक पहुंच अब भी आसान नहीं हो पाई.
तेजी से बढ़ी कॉलेजों की संख्या
रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई है कॉलेजों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन उनका वितरण पूरे देश में बराबर नहीं है. 2010 में जहां प्रति एक लाख युवाओं पर 29 कॉलेज थे, वहीं 2021 में यह संख्या बढ़कर 45 हो गई. यानी औसतन हालात बेहतर हुए. लेकिन जब जिलेवार आंकड़े देखे गए, तो तस्वीर अलग दिखी.
उत्तर और पूर्वी भारत के कई जिलों में अब भी प्रति एक लाख युवाओं पर 18 से भी कम कॉलेज हैं. इसका मतलब यह है कि वहां रहने वाले छात्रों को पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है. कई बार दूरी, खर्च और साधनों की कमी के कारण वे आगे की पढ़ाई छोड़ देते हैं.
क्या है बड़ी खामिया?
यानी एक तरफ शहरों और कुछ राज्यों में कॉलेजों की भरमार है, तो दूसरी तरफ कई इलाकों में आज भी कमी है. कई निजी कॉलेजों में सीटें तो हैं, लेकिन अच्छे शिक्षक नहीं. कई जगह भवन तो हैं, लेकिन प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय कमजोर हैं. ऐसे में छात्र डिग्री तो ले लेते हैं, लेकिन ज्ञान उतना नहीं मिल पाता जितनी जरूरत है.
यह रिपोर्ट साफ बताती है कि सिर्फ संख्या बढ़ाना काफी नहीं है. जरूरी है कि शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच दोनों पर बराबर ध्यान दिया जाए. ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में सरकारी कॉलेजों की जरूरत अब भी बहुत है. वहां कम फीस में अच्छी पढ़ाई उपलब्ध कराना समय की मांग है. साथ ही, निजी संस्थानों के लिए भी सख्त नियम और निगरानी जरूरी है, ताकि वे सिर्फ व्यापार न बन जाएं.
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