Vastu For Land: वास्तु शास्त्र के अनुसार, किसी भी घर, मंदिर या भवन के निर्माण से पहले भू परीक्षा (भूमि परीक्षण) को काफी जरूरी माना गया है. प्राचीन ग्रंथों में साफतौर पर कहा गया है कि, जिस भूमि पर निर्माण कार्य किया जाएगा उसकी प्रकृति, मिट्टी के गुण, आसापास का वातावरण और खुदाई के समय मिलने वाली वस्तुओं का परीक्षण जरूर करना चाहिए.
मान्यताओं के मुताबिक उचित भूमि पर बनाया गया घर सुख-समृद्धि और शांति देता है, जबकि अशुभ भूमि जीवन में बाधाएं और कष्टों को आकर्षित करती है.
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भूमि के प्रकार उनकी पहचान
वास्तु शास्त्र के अनुसार, जमीन को मुख्य रूप से 4 प्रकारों में बांटा गया है- ब्राह्मणी, क्षत्रिय, वैश्या और शूद्र भूमि. इसका उल्लेख कल्पद्रुम ग्रंथ में देखने को मिलता है.
“सुगंधा ब्राह्मणी भूमि रक्तगंधा तू क्षत्रिय।
मधुगंधा भवेद् वैश्याम् मद्यगंधा च शूद्रिका।। ” -कल्पद्रुम
इस श्लोक के मुताबिक जिस जमीन से सुगंध आती है, वह ब्राह्मणी भूमि कहलाती है और इसे सबसे श्रेष्ठ माना गया है. इसकी मिट्टी अक्सर सफेद रंग की होती है और इस पर कुश घास पाई जाती है. ऐसी जमीन को शांत, पवित्र और शुभ फल देने वाली जमीन माना गया है.
जिस भूमि से रक्त जैसी गंध महसूस हो और मिट्टी लाल रंग की होती है, तो उसे क्षत्रिय भूमि कहा गया है. इस भूमि पर आमतौर पर मुंज घास पाई जाती है और इसे साहस, ताकत और पराक्रम से जुड़ा माना जाता है.
वैश्या भूमि की मिट्टी हरे रंग की होती है और इसमें धान्य या अनाज जैसी सुगंध आती है. यह भूमि बिजनेस, कृषि और आर्थिक उन्नति के लिए अनुकूल मानी जाती है.
वहीं शू्द्र जमीन काले रंग की मिट्टी वाली होती है, और उसमें मद्य (शराब) जैसी गंध आती है. इस जमीन पर अलग-अलग तरह की घास पाई जाती है और इसे सामान्य इस्तेमाल के लिए सही माना गया है.
भूमि के आसापास का वातावरण कैसा होना चाहिए?
वास्तु शास्त्र के अनुसार, केवल मिट्टी ही नहीं, बल्कि जमीन के आसपास का वातावरण भी उसकी गुणवत्ता को दर्शाता है. इस विषय में बृहत्संहिता में कहा गया है कि, यदि किसी भूमि के आसपास सुगंधित पेड़, औषधीय पौधे और हरियाली हो, तो वह भूमि अत्यंत शुभ मानी जाती है.
ऐसी भूमि को इंसानों के निवास के लिए सही माना गया है, क्योंकि वहां का वातावरण सेहत और समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है. इसके विपरीत यदि भूमि के आसपास कांटेदार पेड़-पौधे, गंदगी, कीचड़ या विषैले जीवों का निवास हो, तो उसे अशुभ माना गया है.
अच्छी भूमि के संकेत
भूमि के शुभ लक्षणों का वर्णन ‘मयमतम्’ ग्रंथ में भी मिलता है।
“श्वेतासृक् पीतकृष्णा हयगजनिनदा षड्रसा चैकवर्णा,
गोधान्याम्भोजगन्धोपलतुषरहिता वाक्प्रतीच्युन्नता या।
पूर्वो दग्वारिसारा वरसुरभिमसा शूलहीनास्थिवर्ज्या,
सा भूमिः सर्वयोग्या कणदररहिता सम्मता द्यैर्मुनीन्दैः।। ”
– मयमतम् (अध्याय 201)
इस श्लोक के मुताबिक वह भूमि उत्तम मानी जाती है, जिसकी मिट्टी साफ और एकसमान हो, जिसमें कंकड़ या छिलके न हों, जहां पशुओं और धान्य की सुगंध हो. इसके साथ ही जहां बीज सूखते न हों. ऐसी भूमि को सभी तरह के निवास के लिए उपयुक्त बताया गया है.
भूमि की पारंपरिक परीक्षा
वास्तु शास्त्र में भूमि की परीक्षा के लिए कुछ पारंपरिक परीक्षण भी बताए गए हैं. इनमें से एक परीक्षण यह है कि जमीन के बीच में करीब एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसी मिट्टी से उसे भर दिया जाए.
यदि गड्ढा भरते वक्त मिट्टी कम पड़ जाए, तो भूमि को अशुभ माना जाता है. यदि मिट्टी बराबर हो जाए, तो भूमि सामान्य मानी जाती है. वहीं मिट्टी बच जाए तो उसे शुभ संकेत माना जाता है.
एक अन्य परीक्षण में गड्ढा खोदकर उसमें पानी भर दिया जाता है. यदि अगले दिन तक उसमें पानी बना रहे, तो भूमि शुभ मानी जाती है. लेकिन भूमि फट जाए या पानी पूरी तरह सूख जाए तो उसे अशुभ संकेत माना जाता है.
इसके बारे में वास्तु ग्रंथ में कहा गया है कि, “ततो भूमि परीक्षेत वास्तुज्ञानविशारदः, अर्थात् वास्तु के ज्ञाता को सबसे पहले भूमि की परीक्षा जरूर करनी चाहिए।
खुदाई में मिलने वाली वस्तुओं के संकेत
जमीन की खुदाई के दौरान मिलने वाली वस्तुओं को भी शुभ और अशुभ संकेत माना गया है. वास्तु के जानकार कहते हैं कि, यदि खुदाई में हड्डी, कोयला, फटे कपड़े या सांप के अंडे मिलें तो इसे अशुभ माना जाता है और ऐसी भूमि पर निर्माण कार्य से बचना चाहिए.
वहीं अगर खुदाई के समय शंख, कछुआ, पत्थर, ईंट या धातु जैसी वस्तुएं मिलें, तो इसे शुभ संकेत माना गया है. मान्यताओं के मुताबिक ऐसी भूमि पर घर बनाने से पैसा, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है.
वास्तु शास्त्र में भूमि परीक्षा केवल धार्मिक परंपरा पर ही नहीं, बल्कि भूमि की प्रकृति और गुणवत्ता को समझने का एक बेहद प्राचीन तरीका है. मिट्टी के रंग, गंध और आसपास का वातावरण और खुदाई के दौरान मिलने वाली वस्तुएं यह संकेत देती हैं कि, जमीन निर्माण कार्य के लिए कितनी सही है.
इसी वजह से प्राचीन ग्रंथों में किसी भी भवन या मंदिर के निर्माण से पहले भूमि परीक्षण काफी जरूरी है.
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