पटना में गैस संकट: छात्रों का चूल्हा बुझा, 400 रु/किलो गैस, दही-चूड़ा और सत्तू से हो रहा गुजारा


इराक और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध का व्यापक असर अब भारत में भी दिखने लगा है. देश के कई राज्यों के साथ-साथ बिहार की राजधानी पटना में एलपीजी (LPG) गैस की भारी किल्लत हो गई है.

हालांकि, जिला प्रशासन कालाबाजारी और ब्लैक मार्केटिंग रोकने के लिए सख्ती का दावा कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. इस गैस संकट की सबसे बड़ी मार पटना में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हजारों छात्रों पर पड़ रही है.

400 रुपये प्रति किलो बिक रही गैस

पटना के प्रमुख एजुकेशन हब माने जाने वाले राजेंद्र नगर, बहादुरपुर, बाजार समिति, मुसल्लहपुर हाट और भिखना पहाड़ी जैसे इलाकों में 50 हजार से अधिक छात्र किराए के कमरों और लॉज में रहते हैं. ये छात्र आमतौर पर 3 या 5 किलो वाले छोटे सिलेंडरों पर अपना खाना बनाते हैं. गैस की किल्लत के कारण छोटे सिलेंडरों की रिफिलिंग करने वाली अधिकांश दुकानें बंद हैं. जो गिनी-चुनी दुकानें गैस दे भी रही हैं, वे 90 रुपये प्रति किलो मिलने वाली गैस के लिए अब 400 रुपये प्रति किलो तक की मनमानी कीमत वसूल रही हैं.

छात्रों का बजट बिगड़ा, दही-चूड़ा बना सहारा

गैस के दामों में हुई इस बेतहाशा वृद्धि ने छात्रों का मासिक बजट पूरी तरह से बिगाड़ दिया है. मुसल्लहपुर में रहकर दरोगा की तैयारी कर रहे अंकित ने बताया, “तीन दिन से मेरी गैस खत्म है. 5 किलो गैस भरवाने के लिए अब 2000 रुपये मांगे जा रहे हैं. इतनी महंगी गैस खरीदना हमारे लिए संभव नहीं है, इसलिए हम लोग चूड़ा-दही खाकर गुजारा कर रहे हैं.”

बाजार समिति के छात्र मनोहर की व्यथा भी कुछ ऐसी ही है. वे कहते हैं, “घर से महीने के 3500 रुपये मिलते हैं, जिसमें 1500 रुपये कमरे का किराया देना होता है. अगर 2000 रुपये केवल गैस में लगा देंगे, तो बाकी खर्च कैसे चलेंगे? इसलिए अब सत्तू और चूड़ा-दही ही हमारा एकमात्र भोजन है.”

लकड़ी के चूल्हे पर शिफ्ट हुए दुकानदार

छात्रों की परेशानी सिर्फ खुद खाना बनाने तक सीमित नहीं है. इन इलाकों में छात्रों पर निर्भर नाश्ते और भोजन की दुकानों (होटलों) का भी बुरा हाल है. गैस न मिलने के कारण कई दुकानदारों ने अब लकड़ी पर खाना बनाना शुरू कर दिया है. एक समोसा विक्रेता ने बताया कि ब्लैक में 2000 रुपये में गैस लेने पर समोसे के दाम दोगुने करने पड़ेंगे, जिससे छात्र-ग्राहक टूट जाएंगे. इसलिए दो दिन दुकान बंद रखने के बाद अब मजबूरी में लकड़ी के चूल्हे का रुख करना पड़ा है. वहीं, इलाके में चलने वाले कई मेस (Mess) या तो बंद हो गए हैं या उन्होंने अपनी 60 रुपये वाली थाली की कीमत दोगुनी कर दी है, जिसे चुकाना आम छात्रों के बस की बात नहीं है.

परीक्षा के बाद घर लौटने की तैयारी में छात्र

कई छात्र केवल अपनी आगामी परीक्षाओं के कारण रुके हुए हैं. एक छात्रा ने बताया कि सिविल कोर्ट चपरासी (Peon) की परीक्षा के कारण वे लोग किसी तरह पटना में टिके हैं. वहीं सहरसा के रहने वाले रेलवे अभ्यर्थी मनोज कुमार ने स्पष्ट किया कि अगर एक-दो दिन में हालात नहीं सुधरे, तो वे लोग वापस अपने घर लौट जाएंगे.

कई छात्र जिनका कोई एग्जाम नहीं था, वे बिना भोजन के पटना में रहना असंभव मानकर पहले ही अपने-अपने गांव लौट चुके हैं. कुल मिलाकर, गैस की इस किल्लत ने पटना में रहकर अपने सपनों को बुन रहे छात्रों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है.



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