हिजबुल्लाह-हूती और हमास से बैलिस्टिक मिसाइल तक… सद्दाम हुसैन के बाद ईरान ने खुद को जंग के लिए कैसे किया था तैयार?


इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के 2003 में पतन के बाद ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति को पूरी तरह बदलते हुए लंबी तैयारी शुरू कर दी थी. पिछले दो दशकों में उसने ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा और जवाबी रणनीति विकसित की, जिसका मकसद किसी बड़े हमले की स्थिति में भी लंबे समय तक लड़ाई जारी रखना है. इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा ‘मोजेक डॉक्ट्रिन’ है, जिसने अमेरिका और इजरायल को भी हैरान किया है.

‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ के जरिए प्रॉक्सी नेटवर्क
ईरान ने क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने और प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए दबाव बनाने के लिए ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ नाम का प्रॉक्सी नेटवर्क तैयार किया. इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन के हूती मूवमेंट, गाजा का हमास और इराक की कई शिया मिलिशिया शामिल हैं. इस रणनीति को ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि अगर ईरान पर हमला होता है, तो ये सहयोगी समूह इजरायल और अमेरिका को कई मोर्चों पर उलझा सकते हैं.

मिसाइल और ड्रोन प्रोग्राम को बनाया ताकत
ईरान ने पिछले वर्षों में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन तकनीक पर तेजी से काम किया. उसने फतेह मिसाइल फैमिली और शाहाब मिसाइल फैमिली जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित कीं. इसके साथ ही शाहेद ड्रोन फैमिली जैसे ड्रोन भी बनाए गए. ये हथियार अपेक्षाकृत सस्ते हैं, लंबी दूरी तक मार कर सकते हैं और बड़ी संख्या में इस्तेमाल कर अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव डाल सकते हैं.

‘मोज़ेक डॉक्ट्रिन’ क्या है
ईरान की ‘मोजेक डॉक्ट्रिन’ या ‘डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस (DMD)’ एक ऐसी सैन्य रणनीति है जिसे मुख्य रूप से आईआरजीसी ने 2000 के दशक से विकसित किया. इसका मकसद यह है कि अगर दुश्मन शीर्ष नेतृत्व या केंद्रीय कमांड को निशाना बनाए, तब भी सेना और सुरक्षा ढांचा टूटे नहीं और युद्ध जारी रह सके. इस रणनीति का नाम ‘मोजेक’ इसलिए रखा गया है क्योंकि यह घरों में लगने वाली टाइल्स की तरह काम करती है- छोटे-छोटे हिस्से जो अलग-अलग होते हुए भी मिलकर एक मजबूत ढांचा बनाते हैं. अगर एक हिस्सा नष्ट हो जाए, तो बाकी हिस्से काम करते रहते हैं.

31 प्रांतों में फैला स्वतंत्र सैन्य ढांचा
इस रणनीति के तहत आईआरजीसी को ईरान के 31 प्रांतों में स्वतंत्र यूनिट्स में बांटा गया है. हर यूनिट को काफी हद तक स्वायत्तता दी गई है. इन यूनिट्स को जरूरत पड़ने पर मिसाइल, ड्रोन या अन्य हमले खुद शुरू करने की अनुमति होती है, उन्हें हर बार तेहरान से आदेश का इंतजार नहीं करना पड़ता.

कमांड और हथियारों का विकेंद्रीकरण
मोजेक डॉक्ट्रिन के तहत कमांड, हथियार, संचार व्यवस्था और सैन्य बलों को पूरे देश में फैलाकर रखा जाता है. इसके साथ ही नेतृत्व की कई स्तरों वाली उत्तराधिकार श्रृंखला बनाई जाती है. अगर कोई कमांडर मारा जाता है, तो अगला अधिकारी तुरंत कमान संभाल लेता है. इस व्यवस्था में कोई एक ‘केंद्रीय दिमाग’ नहीं होता जिसे नष्ट करने से पूरी प्रणाली ठप हो जाए.

परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल रक्षा
2003 के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर भी तेजी से काम किया. AMAD प्रोजेक्ट को 2003 में आधिकारिक रूप से निलंबित कर दिया गया था, लेकिन बाद के वर्षों में ईरान ने परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को आगे बढ़ाने के प्रयास जारी रखे.

नौसैनिक रणनीति और होर्मुज स्ट्रेट
ईरान ने समुद्री युद्ध की रणनीति पर भी ध्यान दिया. खासकर स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज में माइन बिछाने, तेज गति वाली नौकाओं और एंटी-शिप मिसाइलों के इस्तेमाल की योजना बनाई गई. यह रणनीति 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध से मिले अनुभवों पर आधारित है.

मौजूदा युद्ध में शुरुआती प्रतिक्रिया कमजोर
मौजूदा संघर्ष में शुरुआती दौर में ईरान की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत कमजोर दिखी. विशेषज्ञों का मानना है कि 2024-2025 के दौरान इजरायल ने उसके कई प्रमुख सहयोगियों को कमजोर कर दिया था.

इनमें लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास और सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति बशर-अल-अशद की ताकत शामिल है. विश्लेषकों के अनुसार फिलहाल ईरान ‘सर्वाइवल मोड’ में है. वह मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश कर रहा है. साथ ही खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाकर वैश्विक स्तर पर दबाव बनाने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है.

अमेरिका-इजरायल का लक्ष्य और ईरान की प्रतिक्रिया
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल का अंतिम लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन हो सकता है. हालांकि, ईरान का दावा है कि उसकी विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना उसे इराक में सद्दाम हुसैन के शासन की तरह अचानक ढहने से बचाती है.

खामेनेई की मौत के बाद सक्रिय हुई रणनीति

ईरान का कहना है कि मौजूदा युद्ध में अली खामेनेई की मौत के बाद मोजेक डॉक्ट्रिन को सक्रिय कर दिया गया है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि लगातार हो रही बमबारी का असर सीमित है, क्योंकि देश की सैन्य संरचना पूरी तरह विकेंद्रीकृत है. ईरान का दावा है कि इस रणनीति की वजह से वह यह तय करने की स्थिति में रहता है कि युद्ध कब और किस तरह खत्म किया जाए.



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