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भगवान के सामने प्रार्थना का एक अर्थ निवेदन भी होता है. जब हम नतमस्तक होकर परमात्मा से निवेदन करते है तो वह निवेदन ही प्रार्थना बन जाता है. प्रार्थना वस्तुतः स्वयं से ईश्वर से जोड़ने की प्रक्रिया है.  जब हमारा अन्त:करण निराशा, दुःख, क्षोभ, वेदना से घिरा होता है, समस्याओं से निकालने का कोई और उपाय हमारे बस में नहीं रह जाता तब प्रार्थना एक ऐसी साधना है जो हमें प्रकाश कि किरण प्रदान करती है.  वस्तुतः जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते है, और सच्चे मन से उसे समर्पित हो जाते है, तब हम विषयो और समस्याओं से कही ऊपर उठ जाते है. और इसी समय हम कही ना कही जीवन एवं संसार की क्षण भंगुरता का एहसास होता हे. तब विषय और समस्यायें बहुत छोटी और बोनी हो जाती है और हम उससे बहुत अधिक ऊपर. हर असंभव को संभव बनाने वाला हर बंधन से मुक्त करने वाला सर्वसक्षम, सर्वसमर्थ परमात्मा हमारे अन्त:करण में जाग्रत हो जाता है.

हमारे सामने हर उलझन, मुश्किल, दुःख, शोक, बंधन, पाप, ताप से मुक्त करने वाली ज्ञान की ज्योति जाग्रत हो जाती है., उस समय ना कुछ भी असंभव नहीं रह जाता है और ना ही कुछ नामुमकिन. इसी मनोस्थिति के कुछ पल हमारे मन को अपार ऊर्जा से भर देते है.  नकार्त्मकता काफूर हो जाती है. शायद यह ही वोह स्थिति है जिसके बाद चमत्कारों का सिलसिला चालू हो जाता है. भगवान के सामने प्रार्थना से दैवीय कृपा बरसने लगती है.  ऐसे बहूत से लोग इस संसार में है जिन्होने ईश्वर कृपा को प्रत्यक्ष महसूस किया है, और हम भी कई बार करते है, जिसे इक्तेफाक कह कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

भगवान के सामने प्रार्थना के संबंध में विद्वानों ने अपनी अपनी व्याख्या दी है.  जब हम प्रार्थना के अर्थो की बात करते है तो प्रार्थना के संबंध में महात्मा गाँधी द्वारा उद्वत ये पंक्तिया हमारा मार्गदर्शन करती है.  महात्मा गांधी ने कही पर कहा की मैंने यह अनुभव किया है कि जब हम सारी आशा छोड़कर बैठ जाते हैं, हमारे दोनों हाथ टिक जाते हैं, तब कहीं न कहीं से मदद आ पहुंचती है। स्तुति, उपासना, भगवान के सामने प्रार्थना वहम नहीं है, बल्कि हमारा खाना पीना, चलना बैठना जितना सच है, उससे भी अधिक सच यह चीज है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि यही सच है और सब झूठ है। ऐसी उपासना, ऐसी प्रार्थना निरा वाणी विलास नहीं होती उसका मूल कंठ नहीं हृदय है।(महात्मा गाँधी जीवनी से संग्रहीत)।  मुझे इस विषय में कोई शंका नहीं है कि विकार रूपी मलों की शुद्धि के लिए हार्दिक उपासना एक रामबाण औषधि है। Mahatma Gandhi. एल क्राफर्ड ने प्रार्थना को लेकर कहा था ‘‘ प्रार्थना परिष्कार एवं परिमार्जन की उत्तम प्रक्रिया है।’’

प्रार्थना के कुछ नियम जिनका पालन कर कर हम ईश्वर की कृपा जल्द पा सकते है.

  • भगवान के सामने प्रार्थना की सार्थकता के लिये मन में ईश्वर के प्रती विश्वास प्रबल होना चाहिए. ईश्वर के प्रती मन का विश्वास जीतना मजबूत होगा हम खुद को ईश्वर के उतने ही करीब पाएंगे.
  • मन में प्रार्थना के वक्त किसी के लिये राग द्वेष की भावना नहीं होना चाहीये, भावना आत्मकल्याण एवं परोपकार की ही होना चाहीये. दूसरो का बूरा सोचने वाले एवं दूसरो के अधिकार छीनने की इच्छा रखने वाले की भगवन नहीं सुनता.
  • एकांत मै भगवान के सामने प्रार्थना करना अच्छा होता है. क्यों कि प्रार्थना के दोरान मन की एकाग्रता बहूत जरूरी होती है, जो एकांत में सुलभ होती है.
  • भगवान के सामने प्रार्थना में हम ईश्वर से अध्यात्मिक सूख एवं सांसारिक सूखा दोनों मांग सकते है, पर हमारी भगवान के सामने प्रार्थना सच्चे दिल से निकलनी चाहिए.
  • मन के साथ तन भी शुद्ध हो तो मन को एकाग्र एवं सकारात्मक रखने में मदद मिलती है. इसी लिये मंदिर में जाने के पहले नहाने का नियम है, वस्तुतः आपके नहाने से भगवान् को कोइ फर्क नहीं पड़ता बल्कि, नहाने एवं तन को शुद्ध रखने से मन की अनुकूलता एवं एकाग्रता जल्द प्राप्त होती है.
  • खुद पर भरोसा रखे, जब आप भगवान् से कुछ मांगते है तो भगवान् आप की जरूर सुनता है, परन्तु, आपको अपने प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए. भगवान् आपके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है, परन्तु चलना आपको ही पडेगा.

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